Monday, December 31, 2007

रास्ते में क्या बताऊं

इस एकदम छूटते हुए २००७ के बचे हुए चंद घंटों में साधुवाद की एक नई राह खोजने चला हूं

1 comment:

सुभाष नीरव said...

शायदा के ब्लाग पर तुम्हारी टिप्प्णी पढ़ते हुए तुम्हारे ब्लाग गया। पर अभी कुछ नहीं हैं वहाँ। "साधुवाद" को आशीर्वाद तो नहीं शुभकामनाएं दे सकता हूँ। ब्लाग की दुनिया में तुम्हारा स्वागत है। करो भाई कुछ नया करो, इस अनौखी दुनिया में। जनसत्ता में तुम्हारे लेख तुम्हारी काबलियत दर्शाते रहे हैं। और हाँ, एक सलाह है, अगर मानो तो, अपने ब्लाग्स पर से वर्ड वैरिफिकेशन को हटा दो। इससे कोई फायदा नहीं हैं। पाठक यदि टिप्पणी देना भी चाहते हैं तो इस अनावश्यक अवरोधक को देखकर पीछे हट जाते हैं। शुभकामनाएं !